इज़राइल-फिलिस्तीन और आईपीएल


हर घटना में आजकल हम रोमांच खोजने लगें हैं। यही कारण है कि हम किसी विवाद को विवाद के तरह नहीं देख कर उसे IPL के मैच के तरह देखना पसंद करते हैं और हम उस विवाद के किसी एक पक्ष को अपना पक्ष बना लेते हैं और फिर विरोधी पक्ष के खिलाफ अपनी गोलबंदी शुरू कर देते हैं। सबसे बड़ी बात तो ये है कि हम उस मामले में पक्षकार बनने के लिए ज्यादा जानकारी जुटाना भी मुनासिव नहीं समझते हैं।

जब पूरी दुनिया विकराल कोरोना आपदा के दौर से गुजर रही है तब इसी दौर में इज़राइल और फिलिस्तीन में हिंसक युद्ध का माहौल बना हुआ है। एक तरफ भारत जैसा देश अपनों की जान बचाने के लिए वैक्सीन और ऑक्सीजन के लिए दुनिया के तरफ देख रहा है  तो इसी दौर में गाजा पट्टी वाले खतरनाक हथियार के लिए अन्य देशों से मदद मांग रहें हैं। मैं इस विवाद पर कतई बहस करना पसंद नहीं करूंगा की इज़राइल और फिलिस्तीन में कौन इस हिंसा के लिए जिम्मेदार है पर इतना तो साफ है कि ये विश्व शांति के लिए खतरनाक है।

इज़राइल और फिलिस्तीन विवाद में धर्म एक बहुत बड़ा कोण है जिसके बुनियाद पर ये पूरा विवाद खड़ा है। इज़राइल यहूदियों का देश है और फिलिस्तीन मुसलमानों का देश है। अब मैं यहाँ पर आदर्शवादियों के तरह नहीं कहूँगा की दोनों का खून लाल ही है क्योंकि अगर ऐसा वो लोग सोचते तो शायद अभी मैं ये लेख नहीं लिख रहा होता।
इस युद्ध से अब साफ है कि आज भी धर्म आम लोगों  के लिए अफीम है।

हमारे देश में भी इस मुद्दे पर ट्विटर पर अच्छा-खसा बाबाल मचा हुआ है। हिंदुओं का एक समूह इज़राइल के साथ खड़ा दिख रहा है और मुसलमानों का एक समूह फिलिस्तीन के साथ खड़ा दिख है। दोनों को पास अपने-अपने  तर्क हैं। दोनों के समर्थन और विरोध के अपने धार्मिक कारण हैं। भारत की स्थिति ज्यादा स्पष्ट नहीं है बेशक भारत एक देश है इसकी अपनी सरकार है वो इस मसले पर कोई फैसला लेने से पहले सरकार हर पहलुओं पर विचार करेगी, ऐसे थोड़े ही IPL समर्थकों की तरह इस मामले की पक्षकार बन जाएगी। 




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